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ज्यूडिशियल वारंट के बिना डिजिटल डिवाइस की जब्ती नहीं: एकेडमिक्स ने SC में दिशानिर्देश का मसौदा सौंपा

  • by जेपी सिंह
  • November 15, 2023November 15, 2023
  • 1 minute
  • 0

जांच एजेंसियों द्वारा व्यक्तिगत इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जब्ती के लिए दिशानिर्देश की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पांच एकेडमिक्स ने दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार किया है। अब उन्होंने उक्त मसौदे को सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया है। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच के सामने गुरुवार (9 नवंबर) को मामला आया, जब कोर्ट ने सीनियर वकील नित्या रामकृष्णन को दिशानिर्देशों के इस मसौदे को केंद्र और राज्यों को प्रसारित करने का निर्देश दिया।

गौरतलब है कि राम रामास्वामी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य मामले में दीपावली अवकाश के पहले दरअसल, 7 नवंबर को फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स की ओर से दायर याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारों के डिजिटल डिवाइस जब्त किए जाने पर चिंता जताई थी और केंद्र से कहा था कि बेहतर दिशानिर्देशों की जरूरत है। दोनों याचिकाएं अब 5 दिसंबर को सूचीबद्ध हैं।

ये दिशानिर्देश वकील एस प्रसन्ना के माध्यम से प्रस्तुत किए गए। मसौदा दिशानिर्देशों की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं:

 1. इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जब्ती ज्यूडिशियल वारंट के बाद ही होनी चाहिए; ज्यूडिशियल वारंट प्राप्त न करने के कारणों को दर्ज करते हुए आपातकालीन जब्ती अपवाद होनी चाहिए। हालांकि, किसी भी मामले में यह भी “स्पष्ट रूप से” निर्धारित किया जाना आवश्यक है कि डिवाइस को क्यों और किस क्षमता में जब्त करना आवश्यक है।

2. इस आधार पर जब्ती की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि सबूत मिल सकते हैं। याचिकाकर्ताओं ने समझाया, “दूसरे शब्दों में, सबूत मिलने के अनुमान पर जब्ती किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं होगी, खासकर जहां डिवाइस किसी आरोपी व्यक्ति का नहीं है।”

 3. विशेषाधिकार प्राप्त, पेशेवर, पत्रकारिता, या शैक्षणिक सामग्री को आपातकालीन जब्ती से बाहर रखा जाना चाहिए। इसकी अनुमति केवल ज्यूडिशियल वारंट के माध्यम से ही दी जाएगी और केवल तभी जब सामग्री सीधे अपराध से जुड़ी हो। “यदि इरादा ऐसी विशेषाधिकार प्राप्त, पेशेवर, पत्रकारिता, या शैक्षणिक सामग्री की खोज करना है तो यह केवल ज्यूडिशियल वारंट द्वारा और इस आधार पर होना चाहिए कि उक्त सामग्री सीधे तौर पर जांच के तहत अपराध का हिस्सा है, न कि केवल उसी का सबूत है।”

डिवाइस/सामग्री की खोज, प्रतिधारण और वापसी उपकरण को जब्त करने के तुरंत बाद उसे स्वतंत्र एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सभी सामग्री (अप्रासंगिक, व्यक्तिगत और विशेषाधिकार प्राप्त) की पहचान की जाएगी। इसके अलावा, संबंधित सामग्री को अलग कर दिया जाएगा, जिसके बाद संबंधित सामग्री की कॉपी ली जाएगी। उसके तुरंत बाद डिवाइस वापस कर दिया जाएगा। इसके अलावा दिशानिर्देश यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी भी अन्य बहिष्कृत सामग्री को अपने पास नहीं रखा जाएगा।

मसौदे में कहा गया है कि स्वतंत्र एजेंसी द्वारा प्रारंभिक जांच में डिवाइस के मालिक (या उनके एजेंट) की उपस्थिति में सभी अप्रासंगिक, व्यक्तिगत और विशेषाधिकार प्राप्त सामग्री की अलग से पहचान की जाती है, जांच के लिए प्रासंगिक सामग्री का सीमांकन किया जाता है और केवल ऐसी प्रासंगिक सामग्री की कॉपी होती है, जो ली गई होती है। इस प्रकार बाहर की गई अप्रासंगिक, विशेषाधिकार प्राप्त या व्यक्तिगत सामग्री को बरकरार नहीं रखा जाना चाहिए और जांच या संदिग्ध सामग्री के लिए केवल प्रासंगिक सामग्री की एक प्रति लेने के बाद डिवाइस को तुरंत वापस कर दिया जाना चाहिए।

मालिकों को पासवर्ड देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता तलाशी और जब्ती की स्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के मालिकों को अपना पासवर्ड देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा धारा 69 जैसे वैधानिक प्रावधानों के तहत ऐसा करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य न हों।

मसौदे में आगे कहा है कि जिस व्यक्ति के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को खोजा/जब्त किया जाना है, उसे किसी भी क्रेडेंशियल या पासवर्ड या जानकारी का खुलासा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, जिसमें किसी भी क्लाउड-संग्रहीत जानकारी भी शामिल है, सिवाय इसके कि उदाहरण के लिए वैधानिक रूप से निर्धारित है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 यदि जब लागू हो। इसके अतिरिक्त, सेवा प्रदाताओं/मध्यस्थों से जानकारी प्राप्त करने वाले कानून उन कानूनों में उचित परिस्थितियों में लागू हो सकते हैं।

यह भी निर्दिष्ट किया गया कि पुलिस द्वारा किसी भी व्यक्ति को अपने इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पेश करने के लिए नहीं बुलाया जाएगा, चाहे वह गवाह के रूप में हो या आरोपी के रूप में।

जांच अधिकारी के कर्तव्य के संबंध में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया: “सभी परिस्थितियों में यह जांच अधिकारी का कर्तव्य होगा कि वह प्रासंगिक जानकारी प्राप्त करना और मालिक को समय पर लौटाना या किसी अदालत या अन्य प्राधिकारी (जहां मालिक नहीं मिल सकता है) को सुरक्षित हिरासत सौंपना सुनिश्चित करें, जिससे प्रतियां सुनिश्चित की जा सकें।

अंत में इस बात पर भी जोर दिया गया कि यदि इन बुनियादी सावधानियों का पालन नहीं किया गया तो आरोपी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी सामग्री का उपयोग नहीं किया जाएगा।

मसौदे में कहा गया है कि जहां इन बुनियादी सावधानियों को बनाए नहीं रखा गया है, ऐसी सामग्री का उपयोग किसी भी अदालत में या किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ या किसी भी तरह से नहीं किया जाएगा।

(जे.पी.सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

Tags: digital devices Draft guidelines Draft guidelines submitted judicial warrant No seizure of digital devices sc Supreme Court

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